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MP News: भोपाल मेट्रो की तैयारी अंतिम चरण में: किराया और कनेक्टिविटी तय करेगी सफलता

MP News: भोपाल मेट्रो का कमर्शियल रन सितंबर में शुरू होने जा रहा है, लेकिन सवाल ये है कि क्या इसे पर्याप्त यात्री मिलेंगे? इंदौर मेट्रो में 7 दिन में ही यात्रियों की संख्या घटने लगी, और विशेषज्ञ मानते हैं कि भोपाल मेट्रो की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि स्टेशन तक पहुंचने के लिए अर्बन ट्रांसपोर्ट सिस्टम कितना मजबूत है।

भोपाल मेट्रो का कमर्शियल रन सितंबर से

मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में मेट्रो रेल का कमर्शियल संचालन सितंबर से प्रस्तावित है। यह शहर के सार्वजनिक परिवहन में एक बड़ा बदलाव साबित हो सकता है, बशर्ते इसकी पहुंच और उपयोगिता आम जनता के लिए आसान और सस्ती हो।

फिलहाल मेट्रो की मौजूदा लाइन AIIMS से सुभाष नगर तक बनाई जा रही है, लेकिन एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस रूट पर यात्रियों की संख्या सीमित हो सकती है। और यही कारन है कि इसको विस्तार देना जरुरी है। 

इंदौर मेट्रो में किराया बढ़ा, यात्री घटे

इंदौर मेट्रो में शुरुआती दिनों में काफी भीड़ देखी गई थी, लेकिन जैसे ही किराया लागू हुआ, संख्या घटने लगी। मेट्रो में न्यूनतम किराया ₹20 और अधिकतम ₹30 तय किया गया है, जबकि शहर में मौजूद बसों में मात्र 7 से 20 रुपये में यात्रा की जा सकती है। और यही कारण है की लोग इंदौर मेट्रो को पसंद नहीं कर रहे हैं। 

भोपाल में भी यही इंदौर वाली चुनौती सामने है। यदि मेट्रो का किराया ₹40 तक रखा गया, तो यह प्रति किमी ₹5 बैठेगा – जो रिक्शा और लो-फ्लोर बसों की तुलना में महंगा पड़ेगा। भोपाल मेट्रो को लेकर स्ट्रक्चरल इंजीनियर शैलेंद्र बागरे ने कहा कि “अगर मेट्रो तक पहुंचने का साधन न हो, और किराया महंगा हो, तो आम जनता क्यों चुने मेट्रो?”

सफल मेट्रो के लिए ट्रांसपोर्ट कनेक्टिविटी + अफोर्डेबिलिटी

आर्किटेक्ट सुयश कुलश्रेष्ठ का कहना है कि मेट्रो का रूट भी उतना ही मायने रखता है जितना किराया। AIIMS से सुभाष तक की लाइन में केवल रानी कमलापति रेलवे स्टेशन ही एक महत्वपूर्ण हब है, बाकी स्टेशनों पर यात्रियों की संख्या सीमित होगी।

उनके अनुसार, हर मोहल्ले से मेट्रो स्टेशन तक कोई ना कोई ट्रांसपोर्ट लिंक होना जरूरी है, जैसे फीडर बस, ऑटो, या ई-रिक्शा। वरना मेट्रो का उपयोग केवल चुनिंदा लोगों तक सीमित रह जाएगा।

सरकार का प्लान इंटीग्रेटेड ट्रांसपोर्ट सिस्टम

भोपाल मेट्रो रेल प्रोजेक्ट के एमडी एस. कृष्णा चैतन्य ने बताया कि Integrated Urban Transport System पर काम जारी है। बस, ऑटो और मेट्रो एक-दूसरे से जुड़े रहेंगे ताकि शहर के हर हिस्से से स्टेशन तक आना-जाना आसान हो।

आगे उन्होंने यह भी कहा कि मेट्रो की लाइनों को शहर के सभी प्रमुख क्षेत्रों तक विस्तार दिया जाएगा, जिससे उपयोगिता और यात्री संख्या दोनों बढ़ें।

मेरे अनुसार भोपाल मेट्रो एक शानदार पहल है, लेकिन सिर्फ पटरियां बिछा देने से सफलता नहीं मिलती। मेट्रो को लोगों तक पहुंचाना होगा – “Metro to people, not people to metro!”

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यदि मेट्रो महंगी लगी, और स्टेशन दूर पड़े, तो लोग बस और ऑटो को ही चुनेंगे। इसीलिए जरूरी है कि ट्रांसपोर्ट सिस्टम को जोड़ा जाए और किराया सीमित रखा जाए। सरकार को चाहिए कि पहले पायलट बेस पर ट्रांसपोर्ट लिंक बनाकर देखे फीडर बसें चलाकर, स्मार्ट कार्ड से किराया कम कर के।

भोपाल मेट्रो के सफल भविष्य की कुंजी दो बातें हैं पहला यह है कि कम किराया हो और दूसरा यह कि अच्छी कनेक्टिविटी तगड़ी हो। अब आपकी क्या सोच है, क्या भोपाल मेट्रो सफल होगी? क्या आप ₹40 का किराया देकर मेट्रो लेंगे? कमेंट करके अपनी राय ज़रूर बताएं। और इस तरह की ख़बरों के लिए जुड़े रहें अपना कल न्यूज़ के साथ। 

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